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आज रविवार 20 जून को सुबह-सुबह पंडित मूर्खानंद और पंडित सूरमाचंद आए और कहने लगे कि ये नामकरना का काम शुरू क्यों नहीं हो रहा है? अब तो दारू के पैसे भी ख़त्म
होने लगे है. दारू के बिना तो दिमाग़ भी चलना बंद हो जाएगा.इसपर तरस खाते हुए हमने उनको एक एक बोतल चढ़ाई और पहले नाम का ठेका दे ही डाला. पहला-पहला नाम
हमें अपनी प्यारी मित्र Deepti 'दीप्ति' का याद आया. वैसे भी 'लेडीज़ फर्स्ट' का उसूल है.
नाम सुनते ही पंडित लोग चक्कर खा गये. Deepti or Dipti काफ़ी पेंच भरा नाम लगता है. एक-एक बोतल और चाहिए. दे दी. टल्ली होने के बाद
जब दोनो एक दूसरे को भी 2-2 दिखने लग गए और 'स' को 'श' बोलने लग गए तो दोनो हिन्दी का शब्दकोष खोल कर बैठ गये.
3 घंटे सिर खपाने के बाद दोनो किसी नतीजे पर पहुँचे. बोले, "ये नाम जो 2-2 ही दिख रहा है, दरशल 2 शब्दों के बीच
शन्दि ('संधि') है. शन्दि-छेद (संधि-विच्छेद) करना होगा. डरशल ये नाम अशलियत में 'द्विपति' था जो घिश-घिश
(घिस-घिस) कर 'दीप्ति' हो गया.
द्विपति = द्वि + पति. यानि 2 पतियों वाली!"
उसके बाद पंडित लोग 11 घंटे के लिए लुडक गये. संधि-विच्छेद शायद ग़लत जगह से होने के कारण पहले नाम का अंतिम संस्कार संपन्न हो चुका था.
दुनिया भर की दीप्तियों से निवेदन है की दारू के पैसे भिजवा दें ताकि विद्वानों का दिमाग़ चलता रहे.
आपके नाम का कुछ नहीं बचा तो दूसरियों का क्यों बचे? दूसरियों के प्रति आपका कोई फ़र्ज़ नहीं बनता?
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आज रविवार 27 जून को पंडित लोग फिर आए. बहुत उदास थे ठर्की पंडित श्री मूर्खानाद. उनकी फेव्रिट 'कामसूत्र' की मॉडेल विवेका अब नहीं रही.
आज वो किसी भी नाम का कुछ भी करने को तय्यार नहीं थे. मगर हम भी ठहरे बिज़नेसमैन! दारू क्या फोकट में जाने देते? लगा ही लिया बातों में.
हमने पूछा, "ये आपकी विवेका को घरवाले क्या-क्या कहकर बुलाते होंगे? पापा-मम्मी क्या कहते होंगे?"
जवाब मिला, "विवेका बेटी""भैया क्या कहते होंगे?""विवेका बहन""भाभी क्या कहती होगी,
जिसकी वो 'ननद' या आम भाषा में 'नन्द' थी?" तुरंत जवाब मिला, "विवेकाननद या विवेकानन्द!"
कहकर पंडित जी नशे में रोते हुए चले गये. मगर हमने तो उनसे वो करवा लिया था जो हमारा खुद का करने का अधिकार नहीं है.
यानी एकाध नाम का 'अंतिम संस्कार'!
अगले रविवार को महफ़िल जमाते हैं, तबतक पंडित जी भी कहीं और 'लौ'
लगा लेंगे.....नहीं sorry....ठरक लगा लेंगे.....
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आज 25 जुलाई को पंडित सूरमाचंद और पंडित मूर्खानंद पैसे की कमी से झूझते फिर हमारे पास आ धमके.
जब पूछा गया कि इतने दिन कहाँ थे तो कहने लगे कि एक तो मिले हुए पैसे उड़ा रहे थे, उपर से मूर्खानंद को नई
गर्ल-फ्रेंड मिल गयी थी और ऊपर से पंडित सूरमाचंद के पड़ोसी बजाज साहब सात भर म्यूज़िक सुनाते थे और ज़ोर ज़ोर
से साथ में सीटियाँ भी बजाते थे. मना करने पर कहते थे कि आज बजाने दो, कल से नहीं बजाऊंगा.
सब बहाना था. रोज़ कल कल कहते थे. बंद करना ही नहीं चाहते थे. उनकी बात सुनकर मन में एक उत्सुकता जागी.
हमने कहा कि चलो, आज बजाज पर ही डिस्कशन करते हैं. बजाज का मतलब क्या है? सुनते ही पंडित लोगों ने अपना
गला सॉफ किया और कहने लगे, "ही ही ही...ज़रा गला तर हो जाता तो दिमाग़ भी चलने लगता...."
एक बॉटली चढ़ते ही पंडित मूर्खानंद तोते की तरह बोलने लगे, "देखिए बजाज भी 2 शब्दों को जोड़कर बना है. बज + आज."
सुनते ही मूर्खनंद "यूरेका" बोलकर उठ खड़े हुए. उनकी छलाँग देखकर लगता ही नहीं था कि बॉटल चढ़ाए हुए हैं. बोले, "
हाँ हाँ यही बात है, यही मतलब है. इश्का मतलब है आज नकद कल उधार ! यानी आज तो बजाएँगे ही. कल कभी नहीं आएगा.
नहीं तो उनका नाम 'बजकल' हो जाएगा. उनकी भी मजबूरी है. अच्छा जजमान हम चलते हैं."
"मैने कहा पंडित जी, जाते-जाते अपनी गर्ल-फ्रेंड का नाम तो बताते जाइए."
तो वो बोले, "त्रिशाला". "वाह, कहाँ मूर्खनंद, कहाँ 'त्रिशाला'! ज़रूर हमारी दी गयी मोटी रकम का ही कमाल है", मैने मन में सोचा.
"ये नाम कहीं सुना है...", मैने उत्सुकता जताई.
"हाँ, शन्जे दत्त की बेटी का भी येयिच नाम है."
इससे मेरी उत्सुकता और बढ़ गयी.
मैने कहा, "पंडित जी, लगे हाथ इस नाम का अर्थ भी बताते जाइए. संजू बाबा जैसे विद्वान बाबा ने अगर कोई नाम रखा है तो
फालतू में तो रखा नहीं होगा. ज़रूर कोई गहरा अर्थ होगा. काफ़ी गहराई में अंडरवर्ल्ड, नही-नही मेरा मतलब अंडरग्राउंड में छुपा हुआ."
"हाँ होगा शाब, ज़रूर होगा, मगर हम एक वक़्त में डेढ़ बॉटल ही पी शकते हैं और डेढ़ बॉटल में एक ही अर्थ निकलेगा. हमारे पैशे निकालिए,
अगले हफ्ते आएँगे...." कहकर पंडित सूरमाचंद जी उठ खड़े हुए. काफ़ी शाने हैं. इस बार पक्का वादा ले लिया कि पहली ऑगस्ट को ज़रूर आएँगे.
तो फिर मिलते हैं अगले हफ्ते.....